असदुद्दीन AIMIM ने बिगाड़ा तेजस्वी का खेल, एनडीए को मिली जीत की वजह बने ओवैसी, पूरी रिपोर्ट देखें

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पटना– ओवैसी ने तेजस्वी को धता बताते हुए महागठबंधन की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। पर इन चुनावों में सबसे तगड़ा झटका तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाले आरजेडी को लगा है। अब तक मुस्लिम वोट बैंक को अपने साथ जोड़े रखने वाली पार्टी को सीमांचल इलाके में असदुद्दीन औवेसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन ने जोर का झटका दिया है। ओवैसी की पार्टी ने इस इलाके की 5 सीटों पर कब्जा जमाया है। इस जीत के साथ ही ओवैसी के हैदराबाद स्थित घर पर उनके समर्थकों ने जमकर आतिशबाजी की।

AIMIM का जलवा, आरजेडी हुई फेल
AIMIM ने बिहार चुनाव में 20 उम्मीदवार खड़े किए थे, जिनमें से 14 कैंडिडेट सीमांचल के इलाके में थे। ओवैसी की पार्टी ने इनमें से 5 सीटें जीती और बाकी के 15 सीटों पर वोट काटकर आरजेडी को तगड़ा नुकसान पहुंचाया। AIMIM ने अमौर, कोचाधमान, बहादुरगंज, बैसी और जोकीहाट सीट पर बड़ी जीत दर्ज की।

आरजेडी के गढ़ में AIMIM की बंपर जीत
आरजेडी के गढ़ माने जाने वाले बैसी में AIMIM के उम्मीदवार सईद रुकनुद्दीन ने आरजेडी के हाजी अब्दुस सुभान को तीसरे नंबर पर धकेल दिया। बीजेपी के उम्मीदवार विनोद कुमार यहां दूसरे नंबर पर रहे। ओवैसी ने इन इलाकों में जमकर प्रचार किया था और CAA और NRC के मुद्दे पर केंद्र सरकार पर जमकर हमला किया था। बता दें कि 2019 में किशनगंज उपचुनाव में AIMIM ने पहली बार जीत का स्वाद चखा था।

वेद प्रकाश पांडेय का विश्लेषण:

आलोचनाओं को पीछे छोड़ तेजस्वी ने लड़ी ये लड़ाई
चुनाव से पहले तेजस्वी यादव कोरोना के समय बिहार से लगातार गायब रहे, इसकी बहुत आलोचना हुई। लोग कहते थे कि उन्हें बिहार में रहना चाहिए, जमीन पर नहीं दिखे। इसकी चर्चा होती थी कि आखिर तेजस्वी इतना वाकओवर क्यों दे रहे हैं। तब उनके घर में पारिवारिक कलह भी चल रहा था। उनके भाई तेजप्रताप और उनकी पत्नी ऐश्वर्या के बीच केस चल रहा है। मीसा भारती को लेकर भी चर्चाएं थी कि वो राजनीति में अपनी कद बढ़ाना चाहती हैं। इन सबके बीच तेजस्वी यादव दिल्ली में कैंप करते रहे, कई बार वो बाहर भी गए। एक बार ऑन एयर चार्टर्ड प्लेन में जो उन्होंने पिछला बर्थडे मनाया, उसे लेकर कहा गया देखो- कैसे एक गरीब का बेटा एयरप्लेन में बैठकर बर्थडे केक काट रहा है। इन सब चीजों को पीछे छोड़ते हुए तेजस्वी यादव ने यह लड़ाई लड़ी। उनका बैकग्राउंड, इस लड़ाई से पहले बहुत कमजोर था। अगर हम कहें कि इस जुलाई से पहले या अगस्त तक की भी चर्चा कर लें तो कोई आरजेडी का नामलेवा नहीं था।

तेजस्वी यादव की पॉजिटिव पॉलिटिक्स
इलेक्शन कमीशन ने जब चुनाव की डेट की घोषणा की तब भी हमें यह लग रहा था कि यह एकतरफा चुनाव है, इसमें आरजेडी के लिए कहीं कोई जगह नहीं है। एनडीए 200 के आसपास सीटें ले आएगा। लेकिन इसके बाद जिस तरीके से तेजस्वी यादव ने पॉजिटिव पॉलिटिक्स की, उन्होंने ये नहीं कहा कि मैं ये कर दूंगा या वो कर दूंगा या इस जाति को यह कर दूंगा। उन्होंने 10 लाख नौकरियों का वादा किया। हां ये जरूर है कि उनके तरीके और उस पर क्या होगा, वो इसे कैसे करेंगे, इसे लेकर जेडीयू और भारतीय जनता पार्टी ने उनपर प्रहार किए। लेकिन हुआ क्या, वो एजेंडा सेटर बन गए। अपने पिता लालू यादव की तरह। दूसरी ओर नीतीश कुमार से लेकर पीएम मोदी तक इसे फॉलो करते रहे, सारा प्रचार तेजस्वी जो कह रहे हैं वो संभव नहीं है, ये बताने के लिए किया।

नीतीश ने चेंज किया अपना एजेंडा!
जेडीयू ने यह देखा कि वो अपने नीतीश कुमार के इस पांच साल के कार्यकाल को जनता के बीच अच्छे से नहीं पहुंचा पा रही है, क्राइम और करप्शन के मुद्दे पर घिरते जा रहे हैं तो उन्होंने एजेंडा चेंज किया। जेडीयू ने तय किया कि अब हम लालू-राबड़ी के उस 15 साल के कार्यकाल की जनता को याद दिलाते हैं और डराते हैं, जिसके कारण नीतीश कुमार पहली बार सत्ता में आए थे। अब सोचिए जो मुख्यमंत्री चौथी बार फुल टर्म मांग रहा हो , वह पहली बार के एजेंडे यानी 2005 के एजेंडे पर चुनाव लड़े, यह कहीं न कहीं नीतीश कुमार की बड़ी कमजोरी साबित हुई। वो यह कहते रहे कि आरजेडी जीती तो ‘जंगलराज’ लौटेगा फिर आपकी बहू-बेटियां कैसे निकलेंगी। ये जो नीतीश का नेगेटिव कैंपने था, इसके कारण कई बार वो अपना आपा खो बैठे। जब युवाओं ने जो 65 लाख यूथ जो पहली वोट देने वाले थे, उनमें से कुछ लोगों ने कांटी मुजफ्फरपुर में उनका विरोध किया, स्लोगन लहराए, जब उनके ऊपर प्याज फेंका गया तब नीतीश ने वो गरिमा नहीं दिखाई जिसके लिए वो जाने जाते हैं।

नीतीश कुमार के खिलाफ लोगों में था गुस्सा
नीतीश कुमार का आपा खो देना और कहना कि अपने मां-बाप से जाकर पूछों, उस समय क्या होता था, उस समय स्कूलों की हालत क्या होती थी। जबकि हमने देखा कि बिहार में स्कूलों की व्यवस्था और बिल्डिंग इतनी अच्छी है कि सब उसकी तारीफ करते हैं लेकिन पढ़ाई को लेकर हमने हर जगह सुना कि 30 साल के लिए हमारी पीढ़ी बर्बाद हो गई। कई बुजुर्गों ने कहा कि हम अपने पोते-पोतियों को स्कूल भेजकर क्या करेंगे। जो शिक्षामित्र हैं, जो नियोजित शिक्षक रखे गए हैं उनकी योग्यता पर सवाल उठ रहे हैं।नेशनल लेवल के सर्वे होते हैं उनमें 8वीं कक्षा के बच्चे दूसरी कक्षा के सवाल हल नहीं कर पा रहे हैं। खासकर इंग्लिश और मैथेमेटिक्स में, जिसको लेकर बिहार के छात्र बहुत जागरूक रहे हैं। इंजीनियरिंग की परीक्षा में, मेडिकल की परीक्षा में अच्छा प्रदर्शन किया है, ऐसे में यह सोचने वाली बात है कि ऐसा क्यों हुआ। इसको लेकर नीतीश कुमार के खिलाफ गुस्सा था।

नीतीश की शराबबंदी से लगभग 100 गुना बढ़ गई थाने की कमाई!
कुमार ने शराबबंदी लागू की। नीतीश कुमार ने महागठबंधन की सरकार में रहते हुए अप्रैल 2016 में शराबबंदी लागू की। नीतीश कुमार का बराबर यह कहना होता है कि “वो एक मीटिंग कर रहे थे तब पीछे बैठी हुई एक दीदी ने कहा कि शराब बंद कर दो, तभी मैंने तय किया शराब बंद कर दूंगा।” अगर देखें तो नीतीश कुमार का यह फैसला सामाजिक स्तर पर बहुत अच्छा है। महिलाओं ने इसको हाथोंहाथ लिया लेकिन इम्पलिमेंटेशन का का क्या हुआ। अगर आज देख लें तो साढ़े तीन लाख लोग शुरू से लेकर अबतक जेल गए, जिनमें से कई लोगों को जमानत मिल गई। लेकिन वो प्रक्रिया जारी है। आप उसके लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बना रहे हैं। जब हमारी छोटी अदालतों में लाखों केस, जिनमें घरेलू विवाद से लेकर जमीन विवाद, मर्डर केस, लूट आदि के मामले लंबित हैं, ऐसे में आप सिर्फ शराबबंदी के केस की सुनवाई करें ये कहां तक उचित है। जेल कम हैं और कैदियों को भेड़-बकरियों की तरह ठूंसा जा रहा है, ये कहां तक उचित है। मांझी जो लौटकर एनडीए में आए हैं, जब वो एनडीए छोड़कर गए थे तब उन्होंने कहा कि यह जो शराबबंदी है, उससे सिर्फ मुसहर, पासवान समाज जैसे निचली जातियों पर असर पड़ रहा है क्योंकि वो सप्लायर बनकर रह गए हैं। और जो नहीं बन पाए वो उसके कारोबार में लग गए। कई नेताओं की मिलीभगत शुरू हो गई। बिहार के जो थाने थे वहां क्या शुरू हुआ, वहां शराब को लेकर एक कैंपेन शुरू हुआ और आज चार साल बाद थाने के जो सारे दारोगा हैं, उनका एक ही लक्ष्य है कि कहां शराब की खेप आई। अंदरखाने की बात करें तो थाने की कमाई लगभग 100 गुना बढ़ गई है।

सुशासन बाबू की छवि पर लौटने का नीतीश के पास मौका
इस बात से आप समझ सकते हैं कि जब पूरा पुलिस महकमा पूरी तरह नीतीश कुमार की शराबबंदी को लागू कराने में जुटा रहेगा तो दूसरे अपराधों का क्या होगा। नीतीश ने कहा कि हम थाने में दो ब्रांच बनाएंगे। एक दारोगा दर्ज मामलों की जांच करेगा तो दूसरा लॉ एंड ऑर्डर देखेगा। लेकिन आज की डेट में ऐसा किसी थाने में लागू हो नहीं हो पाया है। आज आप देखें तो एक ही दारोगा जांच भी करता है और लॉ एंड ऑर्डर भी देख रहा है। वो चुनाव भी कराता है और साथ में इनवेस्टिगेशन भी करता है। मुझे लगता है कि नीतीश कुमार ने अंत भला तो सब भला के नाम पर जो ये आखिरी मौका लिया है उसका इस्तेमाल अपनी सुशासन बाबू वाली छवि वापस पाने के लिए करेंगे।

मुकेश कुमार

एडिटर: मुकेश कुमार

Hindustan18-हिंदी में सम्पादक हैं। किसान मजदूर सेना (किमसे) में राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी के पद पर तैनात हैं।

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