किन्नर समाज के बारे में पूरी जानकारी – About Transgender Group in India

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किन्नर समाज के बारे में  (Transgender group)

पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान श्री विष्णु ने भी मोहिनी का रूप लेकर विवाह किया था। भगवान शिव-पार्वती का अर्द्धनारीश्वर रूप शिव का शक्ति से मिलन का प्रतीक है।

भागवत पुराण में विष्णु के रूप में मोहिनी और शिव के संबंध को भी दर्शाया गया है। राक्षसों के मुख से अमृत छीनने के लिए विष्णु ने मोहिनी का रूप धरा, मोहिनी के रूप पर शिव आकर्षित हो गए और उन दोनों से जो पुत्र उत्पन्न हुआ उसका नाम रखा गया अयप्पा। वर्तमान में केरल स्थित साबरीमाला मंदिर इन्हीं अयप्पा का है जहां महिलाओं का प्रवेश निषेध है।

महाभारत के तमिल संस्करण में उल्लेखित है कि भगवान विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण ने भी मोहिनी का रूप धरकर अरावन से विवाह किया था। इसके पीछे उद्देश्य सिर्फ इतना था कि मृत्यु से पहले अरावन भी प्रेम भावना को महसूस कर ले। अरावन की मृत्यु के बाद मोहिनी रूप में श्रीकृष्ण ने काफी समय तक शोक भी किया था।

देवी-देवताओं के इतर महाभारत काल में अन्य कई रूपों में भी ट्रासजेंडर या किन्नरों को देखा जा सकता है. महाभारत का एक महत्वपूर्ण किरदार शिखंडी का जन्म तो एक लड़की के रूप में हुआ लेकिन दैवीय आदेशानुसार महाराज द्रुपद ने उसका पालन पोषण पुरुष के रूप में किया। यही शिखंडी आगे चलकर भीष्म पितामह की मृत्यु का कारण बना। शिखंडी को आगे कर उसकी आड़ में अर्जुन ने भीष्म पितामह को बाणों की शर शैय्या पर सुला दिया था।

अर्जुन को भी एक श्राप ने उसे किन्नर बना दिया था जब अर्जुन ने अप्सरा उर्वशी के प्रेम निमंत्रण को ठुकरा दिया था तब उर्वशी ने अर्जुन को किन्नर समुदाय का सदस्य होने का श्राप दे दिया था। श्रीकृष्ण ने अर्जुन को आश्वस्त किया कि ये श्राप उनके अज्ञातवास के समय वरदान सबित होगा और कौरवों से मिले अज्ञातवास में बृहन्नला के रूप में अर्जुन ने अपने वनवास का आखिरी वर्ष गुजारा। जहां वह महिला बनकर विराट राजा की पुत्री उत्तरा और उनकी सहेलियों को नाचना-गाना सिखाते थे। कीचक वध के बाद संदेह होने पर दुर्योधन ने कौरवों की सेना लेकर विराट पर आक्रमण किया था तब अर्जुन ने वृहन्नला के रूप में भीषण युद्ध कर उसे पराजित किया था।

समाज में हीन समझे जाने किन्नर समुदाय के लोगों को श्रापित माना जाता है, लोग उनके इस जन्म को उनके पिछले जन्म के पापों का फल मानते हैं। सदियों से किन्नर समुदाय समाज का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है और अब संवैधानिक अधिकार मिलने के बाद उम्मीद है कि उनकी वर्तमान सामाजिक स्थिति में परिमार्जन होगा।

भारत की प्रथम किन्नर जज जोयिता मंडल

भारतीय इतिहास में पहली किन्नर जज जोयिता मंडल ने एक उच्च पद पर स्थापित होकर किन्नर समाज को आगे बढ़ने का आईना दिखाया। इन्होंने किन्नरों की पुरानी परम्पराओं के विरुद्ध पढ़ लिखकर एक ऊंचा ओर आदर्श मुकाम बना एक उदाहरण स्थापित किया हैं। ये वर्तमान में पश्चिम बंगाल के इस्लामपुर में लोक अदालत में जज है। किन्नरों को राजनीति में चुनाव लड़ते देखा जा सकता है और कई उच्च प्रशासनिक पदों पर कार्यरत है।

खूबसूरती की न तो कोई परिभाषा होती है और ना ही सीमा। खूबसूरती की सिर्फ तुलना की जा सकती है, लेकिन आज जिस खूबसूरती की हम बात करने जा रहे हैं वो बेहद ही खास है। खास इसलिए क्योंकि वो एक ट्रांसजेंडर है। वो बेहद आकर्षक और बला की खूबसूरत है। अपनी खूबसूरती की वजह से ही वो मणिपुरियों के बीच मशहूर है। अब अपनी इसी सुंदरता की बदौलत वो दुनिया जीतने निकल रहा है।

सबसे खूबसूरत ट्रांसजेंडर जिसे देख फ़टी रह जाती हैं आँखें

यह मणिपुरी हैं, देखने वाले इन्हें देखते रह जाते हैं…ऐसी ही बला-सी खूबसूरत है बिशेष हुइरेम

27 साल की हुइरेम अपनी सुंदरता की वजह से मशहूर है। खूबसूरती के मामले में सुंदर से सुंदर लड़कियां इनसे मात खा जाए। अब वो थाइलैंड में होने वाली मिस इंटरनेशनल क्वीन ब्यूटी कांटेस्ट में हिस्सा लेने जा रहे है। 9 नवंबर को आयोजित होने वाले इस कॉटेस्ट में मणिपुर और मणिपुरी बोले जाने वाले पड़ोसी इलाके जैसे असम, बांग्लादेश और म्यांमार के ट्रांसजेंडर हिस्सा लेगें हुइरेम इस प्रतियोगिता में शामिल होकर जीतना चाहते है। उनका चयन अभी टॉप 30 में हुआ है, लेकिन वो विजेता बनना चाहते है, ताकि दुनियाभर में उन्हें पहचान मिले।

आज तक इस बात का कोई साइंटिफिक प्रमाण नहीं मिल पाया है कि गर्भ में पल रहा बच्चा किन्नर कैसे बन जाता है? इस सवाल का जवाब एस्ट्रोलॉजी में मौजूद है। उसके मुताबिक, अगर प्रेग्नेंसी के दौरान महिला का गर्भ सीमेन की ज्यादा मात्रा के कारण ठहरा है, तो लड़के का जन्म होता है। अगर खून की मात्रा ज्यादा है, तो बेटी का जन्म होता है। जब सीमेन और खून दोनों बराबर मात्र में होते हैं, तब पैदा होते हैं किन्नर।

किन्नरों की हर साल एक बार शादी होती है। उनका विवाह उनके भगवान अरावन से होती है। हालांकि, ये शादी सिर्फ एक दिन के लिए ही मानी जाती है।

अगले जन्म में नहीं बनना चाहते किन्नर

किन्नर बरुचा माता की पूजा कर उनसे माफी मांगते है कि अगले जन्म में उन्हें किन्नर की तरह जन्म ना लेना पड़े।

किन्नरों का एनुअल फेस्टिवल साल में एक बार मद्रास से 200 मील दूर कूवगम गांव में होता है, जहां पूरे भारत के किन्नर जमा होते है।

हर किन्नर के कोई एक गुरु होते हैं, जिन्हें अपने शिष्य के बारे में सारी जानकारी होती है। उन्हें यहां तक पता होता है कि उस शिष्य की मौत कब होगी। लेकिन ऐसा तब ही हो पाता है, जब गुरु का जन्म ही किन्नर की तरह हुआ हो। ना कि उसने खास प्रक्रिया के बार किन्नर समाज में प्रवेश किया हो।

किन्नर समाज में नए किन्नरों का स्वागत जोरदार तरीके से किया जाता है। इस फंक्शन में नाच-गाने के अलावा अच्छी-खासी दावत का भी आयोजन होता है।

परम्पराएं हिन्दू धर्म की, मगर गुरु होते हैं मुस्लिम। किन्नरों की ज्यादातर परम्पराएं हिन्दू धर्म के मुताबिक निभाई जाती है, लेकिन आपको बता दें कि अधिकांश किन्नर गुरु मुस्लिम होते हैं।

किन्नरों को माना जाता है ब्रह्माजी की परछाई

एक मान्यता के अनुसार, किन्नर भगवान् ब्रह्माजी की परछाई होते हैं। गरीबनंवाज ख्वाजा हजरत मोईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह, अजमेर में देश के सभी किन्नर जियारत करने के लिए आते है।

व्यथा की अनकही कथा

महिला एवं पुरुष हमारे समाज के महत्वपूर्ण हिस्सा माने जाते है, परन्तु एक तीसरा जेंडर भी हमारे समाज का अभिन्न हिस्सा है जिसे समाज में हेय दृष्टी से देखा जाता है। इन्हें कोई ट्रांसजेंडर के नाम से जानता है तो कोई ट्रांससेक्सुअल। लेकिन ज़्यादातर लोग इन्हें किन्नर या हिजड़े के नाम से ही जानते और पुकारते हैं। तीसरे जेंडर का होने पर जिन्हें उनके अपने ख़ुद से दूर कर देते हैं, उन्हें किन्नर समाज पनाह देता है।

किन्नरों के समूह में शामिल होने का मतलब है, एक नई पहचान को अपनाना। ये नई पहचान बाहरी समाज के लिए किसी अछूत से कम नहीं होती। वर्तमान में जब कभी किसी के परिवार में कोई खुशी का अवसर होता है, तो हम देखते हैं कि एक लैंगिक दृष्टि से विवादित समाज के लोग जो प्रायः हिजड़े (अथवा वर्तमान में प्रचलित नाम किन्नर; हालाँकि किन्नर शब्द हिमाचल प्रदेश के किन्नौर निवासियों हेतु प्रयुक्त होता था, जिसे अब हिजड़ों के सन्दर्भ में व्यवहृत किया जाने लगा है) होते हैं, आ जाते हैं और बधाइयाँ गाकर, आशीर्वाद देकर कुछ रूपये लेकर विदा हो जाते है। हम कभी यह जानने का प्रयास नहीं करते कि ये किन्नर कौन हैं, कहाँ से आये हैं, इनकी समस्याएँ क्या हैं और वे कौन से कारण हैं, जिनकी वजह से इन्हें किन्नर बनकर एक प्रकार की भिक्षावृत्ति से जीवन-यापन करने को विवश होना पड़ता है।

कौन थे या हैं किन्नर ?

‘किन्नर” हमारे यहां की एक पर्वतीय जन-जाति है और यह जन-जाति हिमाचल प्रदेश के किन्नौर जनपद में रहती है। वहीं उनकी भाषा कन्नौरी है। हमारे यहां के मूर्ति-शास्त्र में भी यक्षों, गन्धर्वों और किन्नरों का सौंदर्य वर्णित है। ये जातियां नृत्य गान और अन्य ललित कलाओं में प्रवीण होती थीं।

क्या किन्नौर जनपद में रहने वाली हमारी किन्नर जन-जाति और हमारे यहां के मूर्ति-शास्त्र में वर्णित यक्षों-गन्धर्वों-किन्नरों को किन्हीं संबंधों में देखा जा सकता है ? तीसरे लिंग के पर्याय की तरह ”किन्नर” शब्द का प्रयोग पूरी की पूरी उस जन-जाति की पहिचान को घातक रूप से भ्रामक बनाता है !

हिन्दू धर्म में किन्नर

सखियों गावहु मंगलचार
या फिर देव असुर गन्धर्व किन्नर।
ये पक्तियां ‘रामचरित्र मानस ‘ की हैं जिसमे त्रेता युग में साफ -साफ किन्नर जाति की स्थिति बताई गई है।

‘सखी ‘ और किन्नर, जो मंगल- कामना करते हुए सीता को राम के गले में वरमाला डालने के लिए उत्साहित करते हैं और जिनके आशीर्वाद के साथ राम -जानकी विवाह संपन्न होता है।

किन्नर वे जाति है जिसने देवताओ यक्षो गन्धर्वों के साथ स्थान पाया है। भारतीय हिंदु संस्कृति में प्राचीन काल से ही किन्नरों का गौरवपूर्ण स्थान रहा है। दूसरे शब्दों में कहा जाये तो किन्नरों के बिना भारतीय संस्कृति अधूरी है।

किन्नर भी इस सृष्टि का हिस्सा है। जैसे आदमी-औरत को परमात्मा ने बनाया है, तो किन्नरों को भी परमात्मा ने बनाया है।

भारत में मुगलों के आगमन के दौरान किन्नरों की स्थिति

मुगलों और नवाबों के हरम में रानियों की देख-रेख व उनकी रक्षा के लिए हिजड़े रखे जाते थे।इन हरम या जनानखाने की रखवाली करना किन्नरों की खास जिम्मेदारी होती थी। हरम यानी वो जगह जहां शाही घराने की महिलाएं रहतीं थीं। यौन अक्षम होने के कारण मध्य काल में हरमों की सुरक्षा हेतु इन्हें सर्वश्रेष्ठ समझा जाता था। मुगलों के समय किन्नर युद्ध करने में माहिर माने जाते थे। मुग़ल शासन के दौरान भी किन्नरों का राज दरबार लगाया जाता था।

इसी दौरान किन्नरों को एक कौतूहल का विषय बनाया गया। कई इतिहासकारों का यहां तक दावा है कि मुग़ल शासन के दौरान कई लोग अपने बच्चों को किन्नर बना दिया करते थे ताकि उन्हें राजा के पास नौकरी मिल जाए ! मुग़ल काल में हजारों की संख्या में राजपूत पुरुषों के जननांगों को काटकर हिजड़ा बना दिया गया और अपने हरम में इन्हें अपनी स्त्रियों की सुरक्षा के लिए तैनात किया गया। इस प्रकार हिजड़ा बनाने की यह प्रक्रिया पुराने समय से चली आ रही है।

भारत में अंग्रेजों के आगमन के दौरान किन्नरों की स्थिति

प्राचीन भारत में जहाँ किन्नरों को आम पुरुषों एवं महिलाओं की तरह अधिकार प्राप्त होते थे उन्हें समाज में सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था एवं योग्यता अनुसार उनके कार्यों का निर्धारण किया जाता था। वहीँ मुगलों के भारत में आगमन के साथ ही उन्हें केवल मुग़ल शासकों की बेगमों की देखभाल हेतु उनके हरम में कार्य करने हेतु नियुक्त किया गया। इसके उपरांत भारत में अंग्रेजों के आगमन के साथ ही इनकी स्थिति दयनीय हो गयी।

गे राइट्स एक्टिविस्ट अंजली गोपालन अंग्रेजों के शासन को जिम्मेदार मानती हैं, उनका कहना है कि “भारत में अब स्थिति अलग है क्योंकि अंग्रेजों के शासन के दौरान यहां इस तरह के कानून बनाए गए. हमारे कानून में स्वाभाविक और अस्वाभाविक की नई परिभाषा दी गई”।

सन 1871 में तत्कालीन अँगरेज़ सरकार क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट या जरायमपेशा अपराध अधिनियम लेकर आई जिसमें इन पर कई प्रतिबन्ध लगाए गए और सन 1897 में इसमें संशोधन करते हुए इन्हें अपराधियों की कोटि में रखते हुए इनकी गतिविधियों पर नजर रखने हेतु एक अलग रजिस्टर तैयार करने को कहा गया। धारा 377 के अंतर्गत इनके कृत्यों को गैर जमानती अपराध घोषित किया गया।

आज़ादी मिलने पर इन्हें जरायमपेशा जातियों की सूची से तो हटा दिया गया किन्तु धारा 377 की तलवार तब भी इनके ऊपर लटकती रही, नवम्बर 2009 में भारत सरकार ने इनकी पुरुषों एवं महिलाओं से अलग पहचान को स्वीकृति प्रदान की तथा निर्वाचन सूची एवं मतदाता पहचान पत्रों पर इनका ‘अन्य’ के तौर पर उल्लेख किया। 15 अप्रैल सन 2015 को उच्चतम न्यायालय ने तीसरे लिंग के रूप में इनके अधिकारों को मान्यता दी है और सभी आवेदनों में तीसरे लिंग का उल्लेख अनिवार्य कर दिया. इतना ही नहीं उच्चतम न्यायालय ने इन्हें बच्चा गोद लेने का अधिकार भी दिया और इन्हें चिकित्सा के माध्यम से पुरुष या स्त्री बनने का भी अधिकार दिया।

भारत में वर्तमान में किन्नरों की स्थिति

किन्नर अखाड़े की आचार्य महामंडलेश्वर लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी व अन्य अनुयायी

सिंहस्थ कुंभ में 13 अखाड़े शामिल होते हैं, लेकिन इस बार कुछ अलग देखने को मिला, इस बार एक नया अखाड़ा बना, और ये अखाड़ा कोई और नहीं बल्कि किन्नर अखाड़ा था। और इसकी अगवानी किन्नर अध्यक्ष लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी ने की। लक्ष्मी टीवी की कलाकार है, और वह बिग बॉस सीजन 5 में भी भाग ले चुकी है। टीवी शो “सच का सामना”, “दस का दम” और “राज़ पिछले जन्म का” में भी देखी जा चुकी हैं और लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी 2008 में संयुक्त राष्ट्र संघ में एशिया-पैसिफिक का प्रतिनिधित्व करने वाली पहली ट्रांसपर्सन थीं।

कहते हैं कि प्रभु राम ने हिजड़ों की निश्छल और निःस्वार्थ भावना से प्रसन्न होकर इनको वरदान दिया कि कलयुग में तुम लोग राज करोगे। कहते हैं कि भगवान राम ने इन्हें यह भी वरदान दिया कि तुम जिन्हें अपना आशीर्वाद दोगे, उसका कभी अनिष्ट नहीं होगा। इसीलिए शुभ अवसरों पर गृहस्थ इनका स्वागत करते हैं और इन्हें मुंहमांगी रकम देकर विदा करते हैं।

आज किन्नर (हिजडा) क्या है एक जाति सूचक शब्द या गाली ! हम समाज में नाई को नाई नही बोल सकते, धोबी को धोबी नही बोल सकते, जमादार को जमादार नही बोल सकते लेकिन किन्नर को हिजडा कह कर उसका अपमान कर सकते हैं।

‘एक मच्छर आदमी को हिजडा बना देता है ‘ अर्थात नपुसंक बना देता है। एक्टर नाना पाटेकर की आवाज में ये फिल्मी डायलाग ये बताता है कि मनुष्य को समाज में क्या उसकी सैक्सपावर से ही पहचाना जाना चाहिए, या फिर मात्र सैक्सपावर ही उसे पुरुषत्व प्रदान करती है।

किन्नर प्रजाति को मुगलों के भारत आगमन के दौरान “हिजड़ा” शब्द प्रदान कर मुगलों की महिलाओं के हरम में कार्य करने हेतु नियुक्त कर दिया गया क्यूंकि मुगलों में महिलाओं का संपर्क गैर मर्दों के साथ निषेध था।

भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग रहे नृत्यकला प्रवीण किन्नर, मुगलों के इस देश में आगमन के बाद “हिजड़े” हुए, अंग्रेजों के आगमन के बाद इन्हें “अपराधी” घोषित किया गया, वहीँ आजादी के बाद अंग्रेजों के मानस पुत्रों ने समलैंगिकता की मांग उठाते हुए इन्हें “गे” में परिवर्तित कर हमारी संस्कृति को धूमिल करने का घिनौना षड़यंत्र रचा।

ट्रांसजेंडर यानी किन्नरों की दुनिया आम आदमी से हर मायने में अलग होती है-

जब एक किन्नर की मौत हो जाती है तो उसके अंतिम संस्कार को गुप्त रखा जाता है। बाकी धर्मों से ठीक उलट किन्नरों की अंतिम यात्रा दिन की जगह रात में निकाली जाती है।

-किन्नरों के अंतिम संस्कार को गैर-किन्नरों से छिपाकर किया जाता है। इनकी मान्यता के अनुसार अगर किसी किन्नर के अंतिम संस्कार को आम इंसान देख ले, तो मरने वाले का जन्म फिर से किन्नर के रूप में ही होगा।

– वैसे तो किन्नर हिन्दू धर्म की कई रीति-रिवाजों को मानते हैं, लेकिन इनकी डेड बॉडी को अग्नि में जलाया नहीं जाता। इनकी बॉडी को दफनाया जाता है।

– अंतिम संस्कार से पहले बॉडी को जूते-चप्पलों से पीटा जाता है। कहा जाता है इससे उस जन्म में किए सारे पापों का प्रायश्चित हो जाता है। अपने समुदाय में किसी की मौत होने के बाद किन्नर अगले एक हफ्ते तक खाना नहीं खाते।

– आपको जानकर आश्चर्य होगा कि किन्नर समाज अपने किसी सदस्य की मौत के बाद मातम नहीं मनाते। इसके पीछे ये वजह है कि मौत के बाद किन्नर को नरक रूपी जिन्दगी से से मुक्ति मिल गई।

– मौत के बाद किन्नर समाज खुशियां मनाते हैं और अपने अराध्य देव अरावन से मांगते हैं कि अगले जन्म में मरने वाले को किन्नर ना बनाएं।

हर साल शादी करता है किन्नर

किन्नरों की साल में एक दिन शादी होती है। यह शादी भी भगवान अरावन से होती है। भगवान अरावन की मूर्ति को शहर में घुमाया जाता है। अगले ही दिन किन्नर श्रृंगार उतारकर विधवा की तरह शोक मनाते हैं और सफेद कपड़े पहन लेते हैं।

– किन्नर बहुचरा माता की पूजा कर उनसे माफी मांगते हैं और दुआ मांगते हैं कि अगले जन्म में उन्हें किन्नर की तरह जन्म ना लेना पड़े।

– किन्नरों की ज्यादातर परम्पराएं हिन्दू धर्म के मुताबिक निभाई जाती हैं, लेकिन अधिकांश गुरु मुस्लिम होते हैं।

– इतिहास में कुछ किन्नरों के जंग लड़ने का भी जिक्र है। इनमें से एक थे मलिक कफूर। उन्होंने दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के लिए दक्कन में जंग जीती थी। मलिक काफूर अपने समय का पराक्रमी सेनापति था।

सुबह से शाम तक ऐसा होता है रूटीन … किन्नरों के डेली रूटीन को thelifeofhijra ब्लॉग पर फोटोग्राफर ने अपने फोटोज के जरिए दिखाया है। इसके मुताबिक ज्यादातर किन्नर 6 बजे तक उठ जाते हैं। 10 बजे तक नाश्ता करने के बाद ये काम पर निकल जाते हैं। किन्नरों की अधिकांश कमाई ट्रेनों में गाने के जरिए होती है। इसके अलावा जिस घर में बच्चों का जन्म होता है , उसकी सूचना किन्नरों को अपने सोर्स से मिल जाती है। उनके घरों में टीम के रूप में पहुंच कर ‘बधाई’ देते है, नाच गाना करते है जिसके बदले रूपये, कपड़ों की दक्षिणा लेते हैं। लगभग सभी शहरों, गांवों में दुकानदारों से वसूली कर ये दिनभर में ढाई सौ से बारह सौ रुपए तक कमा लेते हैं। शाम को साढ़े पांच तक ये वापस ट्रेन या बस पकड़कर अपने घरों में लौट आते हैं। रात को 10 बजे तक खाना खाकर साढ़े 11 बजे तक किन्नर सो जाते हैं।

Surendra Negi

एडिटर: Surendra Negi

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