भगवान गणेशजी के रोचक रहस्य

हिंदु धंर्म शास्त्रो के अनुसार गणपति प्रथम पूजनीय हैं जिनकी पूजा सबसे पहले की जाती है। समस्त धार्मिक उत्सवों, मुण्डन, विवाहोत्सव आदि सभी शुभ अवसरों पर सभी कार्य निर्विघ्न सम्पन्न करने के लिए सर्वप्रथम भगवान श्री गणेश जी की पूजा ही की जाती है।

हिन्दू धर्म शास्त्रो के अनुसार जिस शुभ कार्य की शुरुआत गणेश पूजन के बिना होती है, उसका शुभफल मिलने की सम्भावना अत्यंत शून्य होती है।

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गणपति का अर्थ

गण का अर्थ होता है समूह और गणपति का अर्थ है उस समूह का अध्यक्ष। गणेश जी का पूरा शरीर मानव का एवं सर हाथी का है।

गणपति गणेश जी विघ्नहर्ता अर्थात समस्त विघ्नों को दूर करने वाले एवं बुध्दि के देवता कहे जाते है।

गणेशजी का स्वरुप

 गणेश का अति सुन्दर शरीर अपने में कई गूढ़ और विशिष्ट अर्थ को संजोए हुए है।
लम्बा उदर गणपति जी की असीमित सहन शक्ति का प्रतीक है।
चार भुजाएं चारों दिशाओं में सर्वव्यापकता का धोतक हैं ।
गणपति जी की छोटी-छोटी पैनी आंखें उनकी तीक्ष्ण दृष्टि,
विघ्नहर्ता के बड़े-बड़े कान उनकी सुनने की अधिक शक्ति ,
और उनकी लम्बी सूंड तेज बुध्दि का प्रतीक है।

गणेश जी का एक हाथ अभय की मुदा में उठा हुआ हाथ, जो संरक्षण का प्रतीक है – कि गणपति के भक्तो को घबराना नहीं चाहिए – क्योंकि गणपति सदैव अपने भक्तो के साथ है । गणेश जी का दूसरा हाथ नीचे की तरफ है और हथेली बाहर की ओर है या इसमे लड्डू है – जो कहती है कि वह निरंतर हमें सुख समृद्धि दे रहे हैं।

वह अपने दो हाथो में अंकुश और पाश को धारण किये हुए है । उनके एक हाथ में अंकुश जीवन में सजगता का प्रतीक है और और दूसरे हाथ में पाश जीवन में नियंत्रण को बताता है।

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गणेश जी का एक दाँत ही है जो कि एकाग्रचित होने को दर्शाता है इसलिए गणेशजी को एकदंत भी कहा जाता है। इसके पीछे एक कथा है। माना जाता है कि एक बार परशुरामजी जी भगवान शिव के दर्शन के लिए कैलाश पर्वत पर गए। उस समय भगवान भोले नाथ ध्यानमग्न थे अतः गणेशजी ने परशुरामजी को अंदर जाने से रोक दिया।

तब क्रोधित हो कर परशुराम जी ने गणेशजी पर अपने फरसे से वार कर दिया। वह फरसा परशुराम जी को भगवान शिव ने ही दिया था, इसलिए उसका सम्मान रखने के लिए गणेश जी ने उस फरसे का वार अपने दांत पर झेल लिया, जिसके फलस्वरूप उनका एक दाँत टूट गया और वह एकदन्त कहलाये।

गणेश जी चूहे की सवारी करते है । चूहा इस बात का प्रतीक है कि जो बंधन, जिस अज्ञानता में हम घिरे है, चूहा उसे कुतर कर, एक-एक परत को काट कर समाप्त कर देता है। चूहा हमें उस परम ज्ञान की ओर ले जाता है जिसका प्रतिनिधित्व गणेश करते हैं।

शास्त्रो में कई स्थानों में गणेश जी का वाहन सिंह,मयूर, मूषक और घोड़ा को बताया गया है ।

सतयुग में भगवान गणेशजी का वाहन सिंह है और उनकी भुजाएं 10 हैं तथा इनका नाम विनायक है।

त्रेतायुग में भगवान विघ्नहर्ता का वाहन मयूर है, उनकी भुजाएं 6 हैं और रंग श्वेत कहा गया है इसीलिए इन्हें मयूरेश्वर के नाम से बुलाया गया है ।

द्वापरयुग में श्री गजानन का वाहन मूषक है, उनकी भुजाएं 4 एवं रंग लाल हैं। इस लिए इस युग में गणेश जी गजानन नाम से प्रसिद्ध हैं ।

कलियुग में गणपति जी का वाहन घोड़ा है, इनकी 2 भुजाएं और वर्ण धूम्रवर्ण है। इसीलिए कलयुग में उनका नाम धूम्रकेतु भी है।

गणपति जी को रोली का तिलक लगाना चाहिए ।

गणपति जी को लाल रंग के फूल अत्यंत प्रिय है ।

भगवान गणेश दूर्वा और शमी पत्र चढ़ाने से अत्यन्त प्रसन्न होते है ।

गणपति जी को बेसन के और मोदक के लड्डू बहुत हीअति-प्रिय  हैं।

‘ॐ गं गणपतये नम:” मन्त्र का जाप करने से गणपति जी अपने भक्तो पर शीघ्र ही प्रस्सन होते है।

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Author: Hindi Desk

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