शिल्पाचार्य विश्वकर्मा का जीवन चरित्र

 शिल्पाचार्य विश्वकर्मा का जीवन चरित्र

देव शिरोमणि शिल्पाचार्य भगवान विश्वकर्मा का अवतार सतयुग मे हुआ था। आपके पिताजी का नाम ऋषि प्रभास तथा माता का नाम ब्रह्मावादिनी देवी भुवाना था। माघ मासे के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी को आपका जन्म हुआ। भविष्य पुराण प्रतिसर्ग पर्व स्कन्द पुराण काशी खण्ड तथा ज्योतिष के प्तसिद्ध ग्रन्थ वृहद्ध वशिष्ठ मे ऎसा प्रमाण मिलता है कि माघ शुक्ला त्रयोदशी के पुण्य दिन पुनवर्स नक्षत्र के अटाइसवें अंश मे विश्वकर्मा अवतार के रुप मे शिवजी बोले हे पार्वती मेरा जन्म हुआ है।
पांच वर्ष की आयु मे भगवान विश्वकर्मा का तज्ञोपवीत संस्कार हुआ तथा गुरुकुल मे आचार्य जी के पास विधाध्ययन करने लगे वहां पर भी कन्द मूल फल खाकर विधाध्ययन किया कथा ब्रह्मचारी व्रत का एवं गुरु आज्ञा का पालन किया।
गुरुकुल वास मे संपूर्ण शिल्प व अन्य विधाओं का अध्ययन किया अनेक मन्त्रो को साक्षात्कार कर ऋषित्व प्राप्त किया
(ऎउग्वेद मण्डल१० सूक्त८१-८२मे१४ ऋचाओं का विश्वकर्मा सूक्त है जिनका ऋषि है विश्वकर्मा भौवन।) 
इसी प्रकार यजुर्वेद(वाजसनेयी संहिता) अध्याय १७ मंत्र १७ से ३२ तक विश्वकर्मा ऋषि ने साक्षात किया है 
इन मंत्रों का ऋषि एवं देवता विश्वकर्मा है।अर्थवेद एवं सामवेद के भी मंत्रों के विश्वकर्मा ने साक्षात कर ऋषित्व प्राप्त किया। इसके पश्चात आपने शिल्प शास्त्र सबंधी अनेक शास्त्रों की रचना की 

जिनका उल्लेख पं. हरिकेश सत्त जी शास्त्री द्वारा रचित “विश्वकर्मा चरितामृत नामक पुस्तक मे पढे”। 
महान कार्य 
1. सूर्य तेज हरण 
2. राष्ट्र के लिए पुत्र का बलिदान 
3.अमृतघट की रक्षा 
4.सप्त ऋषि शाप मोचन 
5.पार्वती मण्डप 
6.पम्पापिरम 
7.शंकर निवास 
8.यज्ञशाला 
9.विमान रचना- पुष्पक नि:शब्द विमान 
10. सर्वज्ञ यज्ञ का करना 
11.अन्य कल्याणकारी कार्य 
12.शिल्प नैपुण्य से अवगत करना 
13. शिल्पम जगत जीवन का उदघोष आदि अनेक महान कार्य विस्माय जनक स्थिति पैदा कर दी आप निर्माण की विधा के सेने वाले है। 
शिल्पी प्रजापति राजगृह देवगृह अर्थगृह राजक्रीडा बाग प्रतिमा(मूर्ति) भूषण सरोवर कूप बावडी आदि के रचने वाले ये भगवान विश्वकर्मा। जिनके लिये निम्न श्लोक पढे। 
विष्णुश्च विश्वकर्मा चनभिद्दते परस्पर्म
अर्थात- लक्ष्मीपति विष्णु जी अपने को विश्वकर्मा का अवतार बता रहे है कि दोनो मे कोई भेद नही है।-
पदम पुराण कृष्ण्श्च विश्वकर्मा च न भिद्दते परस्परम॥ 
अर्थात भगवान कृष्ण एवं विश्वकर्मा मे कोई भेद नही है। 
पदम पुराण भूखण्ड “वाचस्पति विश्वकर्माडभूदित 
अर्थात- विश्वकर्मा ही बृहस्पति का अवतार है। 
-विष्णु पुराण विश्वकर्माअभवत्वपूर्व ब्राह्मणरस्त्व परातनु: 
अर्थात पूर्वकाल मे विश्वकर्मा ही ब्रह्म जी के दूसरे शरीर के रुप मे अवतरित हुए।स्कन्ध पुराण गणुध्वं ऋध्य: सर्वे पूजनं विश्वकर्मण:। वासुदेव महशेभ्यां…………
अर्थात समस्त ऋषिगण और श्री कृष्ण तथा महादेव जी आदि देवगणों ने भी विश्वकर्मा जी की पूजा कर अपने को धन्य समझा है। मानव की तो बात ही क्या। । भगवान विश्वकर्मा के पांचो पुत्रो का वर्णन करते हुए शिवजी बोले कि हे कार्तिकेय आठ भुजा वाले श्री विश्वकर्मा है। वे सब देवो के महान पिता है चार भुजा वाले श्री विश्वकर्मा की माघ शुक्ला त्रयोदशी के दिन भौवन विश्वकर्मा नाम से संसार मे विदित हुए। 
इन्ही चार भुजा वाले विश्वकर्मा जी से पांच पुत्र तथा पांच पुत्रियां उत्पन्न हुई पांच पुत्रियां 1.सिद्धि 2. बुद्धि 3.उर्जस्वति 4.संज्ञा 5.पद्मा
1.मनु 2.मय 3.त्वष्टा 4.देवज्ञ 5.शिल्पी 
ये पांच ह्री विश्वकर्मा जी के ब्रह्मा रुपी पुत्र है। ये पांचों पुत्र अलग-अलग कार्यों मे सक्ष है जिससे कि संसार के लोग का कल्याण होता है। 
भगवान विश्वकर्मा ने स्वर्ग, भूमि,और सर्व ब्रह्माण्ड का निर्माण किया, उसके अनुसार ब्रह्मा महेश आदि देव गन्धर्व किन्नर पंच महाभूत सजीव चेतन और अचेतन सृष्टि का निर्माण किया।

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Author: Hindi Desk

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