किशन महाराज जीवनी – Biography of Kishan Maharaj in Hindi Jivani

किशन महाराज जीवनी – Biography of Kishan Maharaj in Hindi Jivani

किशन महाराज का जन्म कबीर चौरा काशी में 3 सितंबर 1923 में पारंपरिक रूप से एक संगीतज्ञ के परिवार में हुआ। उस दिन कृष्ण जन्माष्टमी होने के कारण उनका नाम किशन पड़ा। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा पिता पंडित हरि महाराज से शास्त्रीय संगीत मे प्राप्त की। पिता के देहांत के बाद उनके चाचा एवं पंडित बलदेव सहाय के शिष्य पंडित कंठे महाराज ने उनकी शिक्षा का कार्यभार संभाला। किशन महाराज को वर्ष 2002 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था। इसके अलावा उन्हें वर्ष १ में पद्मश्री, वर्ष 1में केंद्रीय संगीत नाटक पुरस्कार, वर्ष १ में अली खान पुरस्कार और वर्ष 2001 में लता मंगेश्कर पुरस्कार भी प्रदान किया गया। उन्होंने एडिनबर्ग और ब्रिटेन में कामन वेल्थ कला समारोह के साथ ही कई अवसरों पर अपने कार्यक्रम प्रस्तुत की। उनके शिष्यों में वर्तमान समय के जाने माने तबला वादक पंडित कुमार बोस, पंडित बालकृष्ण अय्यर, उसंदीप दास, सुखविंदर सिंह नामधारी सहित अन्य नाम शामिल हैं।

कार्य क्षेत्र

किशन महाराज ने तबले की थाप से यात्रा शुरू करने के कुछ साल के अंदर ही उस्ताद फैय्याज खान, पंडित ओंकार ठाकुर, उस्ताद बड़े गुलाम अली खान, पंडित भीमसेन जोशी, वसंत राय, पंडित रवि शंकर, उस्ताद अली अकबर खान जैसे बड़े नामों के साथ संगत की। कई बार उन्होंने संगीत की महफिल में एकल तबला वादन भी किया। इतना ही नहीं नृत्य की दुनिया के महान हस्ताक्षर शंभु महाराज, सितारा देवी, नटराज गोपी कृष्ण और बिरजू महाराज के कार्यक्रमों में भी उन्होंने तबले पर संगत की।

प्रभावशाली व्यक्तित्व-

आदरणीय स्वर्गीय पंडित किशन महाराज प्रभावशाली व्यक्तित्व के धनी थे, माथे पर एक लाल रंग का टिक्का हमेशा लगा रहता था, वे जब संगीत सभाओं में जाते, संगीत सभायें लय ताल से परिपूर्ण हो गंधर्व सभाओं की तरह गीत, गति और संगीतमय हो जाती। तबला बजाने के लिए वैसे पद्मासन में बैठने की पद्धति प्रचलित हैं, किंतु स्वर्गीय पंडित किशन महाराज जी दोनों घुटनों के बल बैठ कर वादन किया करते थे, ख्याल गायन के साथ उनके तबले की संगीत श्रोताओं पर जादू करती थी, उनके ठेके में एक भराव था, और दांये और बांये तबले का संवाद श्रोताओं और दर्शकों पर विशिष्ट प्रभाव डालता था। अपनी युवा अवस्था में पंडित जी ने कई फ़िल्मों में तबला वादन किया, जिनमें नीचा नगर, आंधियां, बड़ी माँ आदि फ़िल्में प्रमुख हैं। कहते हैं न महान् कलाकार एक महान् इंसान भी होते हैं, ऐसे ही महान् आदरणीय स्वर्गीय पंडित किशन महाराज जी भी थे, उन्होंने बनारस में दूरदर्शन केन्द्र स्थापित करने के लिए भूख हड़ताल भी की और संगत कलाकारों के प्रति सरकार की ढुलमुल नीति का भी पुरजोर विरोध किया।

बिंदास जीवन शैली

किशन महाराज का ज़िंदगी जीने का अन्दाज़ बहुत बिंदास रहा। उन्होंने ज़िंदगी को हमेशा ‘आज’ के आइने में देखा और अपनी मर्ज़ी के मुताबिक़ बिंदास जिया। लुंगी कुर्ते में पूरे मुहल्ले की टहलान और पान की दुकान पर मित्रों के साथ जुटान ताज़िंदगी उनका शगल बना रहा। मर्ज़ी हुई तो भैंरो सरदार को एक्के पर साथ बैठाया और घोड़ी को हांक दिया। तबीयत में आया तो काइनेटिक होंडा में किक मारी और पूरे शहर का चक्कर मार आए।

दिनचर्या

उनकी दिनचर्या पूजा पाठ, टहलना, रियाज, अपने शौक़ पूरे करना, मित्रों से गप्पे मारना था। यह सब ज़िंदगी की आखिरी घड़ी तक जारी रहा। वे बड़ी बेबाकी से कहते थे कि मैं कोई उलझन या दुविधा नहीं पालता बल्कि उसे जल्दी से जल्दी दूर कर देता हूं। ताकि न रहे बांस और न बजे बांसुरी। साठ साल पहले शेविंग के दौरान मूंछें सेट करने में एक तरफ छोटी तो दूसरी तरफ बड़ी हो जाने की दिक्कत महसूस की तो झट से उसे पूरी तरह साफ़ करा दिया। इसके बाद फिर कभी मूंछ रखने की जहमत नहीं उठाई। उनकी दिनचर्या बड़ी नियमित थी। प्रात: छह बजे तक उठ जाते थे। बगीचे की सफाई, चिड़ियों को दाना पानी और फिर टहलने निकल जाते थे।

पसंद-नापसंद

किशन महाराज का खानपान का भी अपना अलग स्टाइल था। दाल, रोटी, चावल के साथ छेना या केला और लौकी चाप उन्हें काफ़ी पसंद था। गर्मी के सीजन में दोपहर में सप्ताह में दो तीन रोज सत्तू भी खाते थे। परंपरागत बनारसी नाश्ता पूड़ी-कचौड़ी उन्हें पसंद नहीं था। कभी-कभार किसी पार्टी में पंडित जी पैंट-शर्ट में भी जलवा बिखेरते दिख जाते थे। मगर अलीगढ़ी पायजामा और कुर्ता उनका पसंदीदा पहनावा था। गहरेबाजी, पतंगबाजी और शिकार के शौकीन रहे पंडित जी क्रिकेट और हॉकी में भी ख़ासी दिलचस्पी रखते थे।

पुरस्कार व सम्मान

किशन महाराज को वर्ष 2002 में पद्मविभूषण से सम्मानित किया गया था। उन्हें वर्ष 1973 में पद्मश्री, वर्ष 1984 में केन्द्रीय संगीत नाटक पुरस्कार, वर्ष 1986 में उस्ताद इनायत अली खान पुरस्कार, दीनानाथ मंगेशकर पुरस्कार और ताल विलास के अलावा उत्तरप्रदेश रत्न, उत्तरप्रदेश गौरव भोजपुरी रत्न, भागीरथ सम्मान और लाइफ टाइम अचीवमेंट सम्मान से भी नवाजा गया।

निधन

किशन महाराज 3 सितम्बर 1923 की आधी रात को ही इस धरती पर आए थे और 4 मई, 2008 की आधी रात को ही वे इस धरती को छोड़, स्वर्ग की सभा में देवों के साथ संगत करने हमेशा के लिए चले गए। उनके जाने से भारत ने एक युगजयी संगीत दिग्गज को खो दिया ।

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अनुराग बघेल

एडिटर: अनुराग बघेल

मेरा नाम अनुराग बघेल है। मैं बिगत कई सालों से प्रिन्ट मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़ा हूँ। पत्रकारिकता मेरा पैशन रहा है। फिलहाल मैं हिन्दुस्तान 18 हिन्दी में रिपोर्टर ओर कंटेंट राइटर के रूप में कार्यरत हूं।

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