51 शक्तिपीठों में से विचित्र पूजा वाला यह मंदिर है माँ पाटेश्वरी देवी का

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51 शक्तिपीठों में से यह शक्तिपीठ नेपाल के सीमावर्ती क्षेत्र तुलसीपुर में स्थित है, जहां पर गिरा था सती का बायां स्कन्ध व पाटन वस्त्र, करें पूरी यात्रा – hindustan18.com के साथ।

आस्था/ आध्यत्म– देवी भगवत, स्कन्द और कलिका आदि पुराणों तथा शिव पुराण में वर्णित शक्ति पीठों में से एक श्री मां पाटेश्वरी शक्तिपीठ अथवा देवीपाटन मंदिर अत्यंत प्राचीन और प्रसिद्ध शक्तिपीठ है। यह उन 51 शक्तिपीठों में से एक है जो शिव और सती के प्रेम का प्रतीक है। यहां मंदिर के मुख्य पुजारी करते हैं विचित्र पूजा।

देवी भागवत, स्कन्द और कलिका आदि पुराणों तथा शिव पुराण में वर्णित शक्ति पीठों में से एक श्री मां पाटेश्वरी शक्तिपीठ अथवा देवीपाटन मंदिर अत्यंत प्राचीन और प्रसिद्ध शक्तिपीठ है। यह उन 51 शक्तिपीठों में से एक है जो शिव और सती के प्रेम का प्रतीक है।

पाटन देवी में मां का बायां स्कन्ध गिरा था। कुछ लोग यह मानते हैं कि इस स्थान पर जगदम्बा सती का पाटन वस्त्र गिरा था जिसकी पुष्टि एक प्राचीन श्लोक से भी होती है।

पटेन सहित: स्कन्ध:, पपात यत्र भूतले।
तत्र पाटेश्वरी नाम्ना, ख्यातिमाप्ता महेश्वरी।।

इस शक्ति पीठ के बारे में hindustan18.com की विशेष रिपोर्ट-

उत्तर प्रदेश के जनपद बलरामपुर (नेपाल की सीमा से मिला हुआ) की तहसील तुलसीपुर नगर से 1.5 कि॰मी॰ की दूरी पर सिरिया नाले के पूर्वी तट पर स्थित सुप्रसिद्ध सिद्ध शक्तिपीठ मां पाटेश्वरी का मंदिर देवी पाठन है, जो देशभर में फैलते 51 शक्तिपीठों में मुख्य स्थान रखता है। यह शिव और सती के प्रेम का प्रतीक स्वरूप है। अपने पिता प्रजापति दक्ष के यज्ञ में अपने पति महादेव का स्थान न देखकर नाराज सती ने अपमान से क्रोधित होकर अपने प्राण त्याग दिये। इस घटना से क्षुब्ध होकर शिव दक्ष-यज्ञ को नष्ट कर सती के शव को अपने कंधे पर रखकर तीनों लोक में घूमने लगे, तो संसार-चक्र में व्यवधान उत्पन्न हो गया। तब विष्णु ने सती-शव के विभिन्न अंगों को सुदर्शन-चक्र से काट-काटकर भारत के भिन्न-भिन्न स्थानों पर गिरा दिया। पृथ्वी पर जहाँ-जहाँ सती के शव के अंग गिरे, वहाँ-वहाँ शक्तिपीठ स्थापित हुए। सती का वाम स्कन्ध पाटम्बर अंग यहाँ आकर गिरा था, इसलिए यह स्थान देवी पाटन के नाम से प्रसिद्ध है। यहीं भगवान शिव की आज्ञा से महायोगी गुरु गोरखनाथ ने सर्वप्रथम देवी की पूजा-अर्चना के लिए एक मठ का निर्माण कराकर स्वयं लम्बे समय तक जगजननी की पूजा करते हुए साधनारत रहे। इस प्रकार यह स्थान सिद्ध शक्तिपीठ के साथ-साथ योगपीठ भी है।

मां पाटेश्वरी शक्तिपीठ की महत्ता

यहां मां की मूर्ति है उसके सामने के यज्ञ में पति शिव का स्थान एक सुरंग है जहां मां का स्कन्ध या पट गिरा था इसलिए इसका नाम पातालेश्वरी भी है। यहां एक सूर्य कुण्ड भी है जहां मान्यता है कि श्री परशुराम व द्वापर युग में सूर्यपुत्र महारथी कर्ण ने सूर्यकुंड में स्नान कर दिव्य अस्त्रों की शिक्षा ली। वो रोजाना सूर्य की पूजा करते थे।

बताया जाता है कि मंदिर के निर्माण के वक्त से यहां धूना जल रहा है। इस मंदिर में जो कोई भी श्रद्धालु सच्चे मन से मुराद मांगता है तो मां उसकी हर मुराद पूरी करती हैं। यहां की पूजा बड़ी ही विचित्र व गुप्त होती है। यहां नवरात्रों में बड़ी दूर-दूर से लाखों श्रद्धालु आते हैं और दर्शन करते हैं। यहां चैत्र नवरात्रि में पंचमी के दिन से नाथ संप्रदाय के पुजारी नेपाल से आकर मां की पूजा संभालते हैं और दशमी तक पूजा वही करते हैं।

यहां साल के दोनों नवरात्रों में बड़ा मेला लगता है जिसमें लाखों श्रद्धालु आते हैं और मां की पूजा अर्चना करके पुण्य कमाते हैं।

मां पाटन देवी मंदिर नेपाल और हिन्दुस्तान की सीमा पर स्थित उत्तर प्रदेश के बलरामपुर जिले के तुलसीपुर में स्थित है।

क्या है कथा विस्तार से जानें

पुराणों में देवी भागवत व शिव चरित्र में इस स्थान का वर्णन है। ग्रंथों के अनुसार पिता प्रजापति दक्ष के यज्ञ में पति शिव का स्थान न देख कर उनके अपमान से नाराज जगदम्बा सती ने यज्ञ में कूद कर अपने प्राणों की आहूति दे दी। इससे महादेव शिव ने क्रोधित होकर राजा दक्ष के यज्ञ को नष्ट कर दिया और सती के शव को कंधे पर रखकर उन्मत होकर घूमना शुरू कर दिया। इससे ब्रह्माण्ड में उथल पुथल मच गया और संसार चक्र में व्यवधान उत्पन्न हो गया। तब देवी देवता भगवान विष्णु के पास गए। भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शव को काट कर पृथ्वी पर गिरा दिया। माता के शव के 51 टुकड़े भारत के विभिन्न स्थानों पर गिरे और जहां-जहां ये गिरे वहां-वहां शक्तिपीठ स्थापित हुए।

यहां माता का वाम स्कन्ध सहित पट गिरा था जिससे इसे देवी पाटन के नाम से जाना गया। यह वह मां के मूर्ति के सामने पत्थर से ढका वह स्थान है जहां मां का स्कन्द गिरा था यहां सुरंग बन गया था जिसे अब ढक दिया गया है। यह मां की अष्ट भुजा की वह मूर्ति है जिसकी पूजा अर्चना व श्रृंगार गुप्त तरीके से किया जाता है।

सुरंग पर मशहूर है एक और किवदंती

जब भगवान राम ने सीता जी से लंका विजय के बाद पुनः अग्नि परीक्षा देने की बात कही तो सीता जी को अपमान महसूस हुआ उन्होंने लज्जा से गढ़ते हुए पृथ्वी मां से अपने गोद में समा लेने की प्रार्थना की। तब पृथ्वी फट गयी और धरती मां एक सिंहासन पर बैठ कर निकली और सीता मां को अपनी गोद में बिठा कर पाताल में ले गयी।

मान्यता है कि यही वह स्थान है जहां सीता मां धरती में समायी थीं और यहां सुरंग बन गया था जो पाताल लोक जाता है। इसके मुहाने पर अब एक चबूतरा बना दिया गया है जिसपर कपड़ा बिछा रहता है श्रद्धालु यहां अक्षत-पुष्प व प्रसाद चढ़ा कर पुण्य के भागीदार बनते हैं।

यहां एक अखंड ज्योति है जो मंदिर के निर्माण के समय से ही प्रज्वलित है। जिस कुंड में कर्ण स्नान कर सूर्य की पूजा करते थे मान्यता है कि उसमें नहाने से कुष्ठ रोग समेत अन्य चर्म रोगों का निवारण होता है। अखंड धूना यहां आदि काल से जल रहा है।

मुख्य पुजारी करते हैं विचित्र पूजा

यहां मन्नत के अनुसार लोग मुंडन संस्कार भी धूम-धाम से करते हैं। यहां लोग कई दिनों की पूजा और मन्नत पूरा होने पर खाना बना कर मंदिर के बाहर प्रांगण में रहते हैं और अलसुबह कुण्ड में नहा कर मां की पूजा करते हैं। मंदिर सुबह से शाम 4 बजे तक खुला रहता है। फिर मंदिर के मुख्य पुजारी एक विचित्र सी पूजा के दौरान मुख्य मंदिर के चारो तरफ घूम कर मंदिर के अंदर जाकर कपाट बंद करते हैं और 3 घंटे बाद फिर शाम को 7 बजे कपाट खोल कर बहार आते हैं। तब तक वह अंदर गुप्त पूजा करते हैं फिर मंदिर दर्शन के लिए खुल जाता है।

पंडों की समस्या बहुत बड़ी

तुलसीपुर में स्थित इस शक्तिपीठ में आने वाले श्रद्धालुओं से वहां पर कुछ नकली पंडो का भेष बनाकर के स्थानीय लोग हावी रहते हैं। जो कि मंदिर में प्रवेश करते ही या फिर मंदिर से निकलते समय लोगों से जबरदस्ती धन उगाही करते हैं। ये पण्डा लोगों को जबरदस्ती तिलक लगा देते हैं तथा हाथ में कलावा बांधते हैं तथा मनमानी रकम मांगते हैं। पैसा न देने पर यह लोग गालियां देते हैं व लोगों से झगड़ा तक कर लेते हैं

हिन्दुतान 18 न्यूज़ रूम

एडिटर: हिन्दुतान 18 न्यूज़ रूम

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