महाराजा रणजीत सिंह को एक महायोद्धा के रूप में जाना जाता है। लेकिन प्यार की खातिर खाने भी पड़े कोड़े। पढ़ें उनका इतिहास

महाराजा रणजीत सिंह को एक महायोद्धा के रूप में जाना जाता है।लेकिन प्यार की खातिर खाने भी पड़े कोड़े। पढ़ें उनका इतिहास

महाराजा रणजीत सिंह को सिखों के सबसे दृढ़ और शक्तिशाली राजा के रूप में जाना जाता है ।  इतिहास में उन्हें शेर-ए-पंजाब के नाम से जाना जाता है। रणजीत सिंह का जन्म 13 नवंबर 1780 को गुजरांवाला में हुआ था, जो अब पाकिस्तान में है। उनके पिता का नाम महा सिंह और माँ का नाम राज कौर था। जब रणजीत सिंह महज 12 साल के थे तब उनके पिता ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया,  जिसके बाद उन्हें 1792 में सिख समूह ‘शुक्रचकियों’ का सरदार बना दिया गया। उस दौर में पंजाब के शासक टुकड़ों-टुकड़ों में बंटे हुए थे और उनमें कोई एकता नहीं थी। इन समूहों को ‘मिस्ल’ कहा जाता था। इन समूहों का निर्माण 18वीं सदी के आखिरी दशकों में, पंजाब में मुगलों के पतन के बाद हुआ। महाराजा रणजीत सिंह  की इच्छा थी की इन मिस्लों को एक सूत्र में पिरोई जाये । इसलिए उन्होंने कई सरदारों को जीत कर अपने सैन्य अभियान की शुरुआत की। जिसके बाद उन्होंने 1797-98 के दौरान लगातार दो बार शाह जमान को परास्त किया और 1799 में कन्हैया मिस्ल की मदद से उन्होंने भंगी शासकों को लाहौर में मात दे दी। फिर आने वाले वर्षों के दौरान, उनका सतलुज से लेकर झेलम तक के क्षेत्र पर प्रभुत्व हो गया और इस तरह उन्होंने एक विशाल सिख साम्राज्य की नींव रखी।

बुद्ध सिंह से बदलकर क्यों रखा गया रणजीत सिंह नाम-

बताया जाता है कि महाराजा रणजीत सिंह के बचपन का नाम बुद्ध सिंह था। बचपन में ही चेचक के कारण उन्होंने अपनी बाईं आँख गंवा दी। इस वजह से वह ज्यादा पढ़-लिख नहीं सकते थे। उनका कद ज्यादा बड़ा नहीं था,  लेकिन उन्होंने घुड़सवारी और युद्ध की बारीकियों को खूब सीखा और महज 10 साल की उम्र में वह पहली बार अपने पिता के साथ जंग के मैदान में उतरे। इस युद्ध में फतह हासिल करने के बाद, उनके पिता ने उन्हें रणजीत सिंह नाम दिया। रणजीत सिंह जुलाई 1799 में  जब चेत सिंह की सेना को मात देकर लाहौर किले के मुख्य द्वार पर पहुंचे, तो उन्हें सैनिकों द्वारा शाही सलामी दी गई। यहां पहुंचते ही उन्होंने सबसे पहले औरंगजेब द्वारा बनवाई गई बादशाही मस्जिद में अपना माथा टेका। इसके बाद वह शहर के ही एक अन्य लोकप्रिय मस्जिद वजीर खाँ भी गए। माना जाता है कि चेत सिंह एक अय्याश शासक था और प्रजा उनसे तंग आ चुकी थी। इसलिए लोगों ने रणजीत सिंह को संदेश भेजकर, मदद की अपील की। रणजीत सिंह ने लोगों की मदद करने का फैसला किया और अपने 25 हजार सैनिकों के साथ लाहौर पर अधिकार कर लिया। उन्हें पता था कि लाहौर एक मुसलमान बहुल्य क्षेत्र है।  इसलिए उन्होंने ऐसा एक भी कदम नहीं उठाया, जिससे वे अलग-थलग महसूस करें। उन्होंने तमाम बड़े मस्जिदों को सहायता देना जारी रखा। साथ ही, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उन्हें मुसलमानों के इस्लामी कानून मानने से कोई ऐतराज नहीं है।

1837 में लड़ी अपनी आखिरी लड़ाई-

12 अप्रैल 1801 को रणजीत सिंह पंजाब के महाराजा बने। महज 21 साल की उम्र मे उन्हें ताज पहनाया गया था ,  उस दिन बैसाखी का दिन था। उनका तिलक साहिब सिंह बेदी ने किया। महाराजा बनने के बाद रणजीत सिंह ने अपने दायरे को और व्यापक बनाने का विचार किया और 1802 में उन्होंने अमृतसर पर और 1807 में अफगानी शासक को मात देते हुए कसूर पर अधिकार जमा लिया।

इसके बाद सिखों और अफगानों के बीच, कई बार युद्ध हुए। इस बीच रणजीत सिंह ने 1819 तक मुल्तान और कश्मीर जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों को जीत लिया था। 1837 में, जमरूद का युद्ध उनकी आखिरी लड़ाई थी । इस युद्ध में उनके सामने फिर से अफगान ही थे। लड़ाई में उनके सेनाध्यक्ष हरि सिंह नलवा मारे गए और कुछ सामरिक वजहों से अफगानों ने जीत हासिल करते हुए वापस काबुल पर कब्जा कर लिया। जैसा कि महाराजा रणजीत सिंह सभी धर्मों को साथ लेकर चलना चाहते थे, इसलिए उन्होंने कई मुस्लिम सैनिकों को ऊंचे औहदे पर नियुक्त किया। यहां तक कि लोगों में एकता को बढ़ावा देने के लिए सिक्के पर उनका नाम लिखने के बजाय नानकशाही सिक्के को पेश किया गया था । उस सिक्के पर फारसी में एक वाक्य लिखा रहता था, जिसका अर्थ होता था , “अपने साम्राज्य, अपना विजय और अपनी लोकप्रियता के लिए मैं गुरु नानक और गुरु गोविंद सिंह का ऋणी हूं।

सेना को किया सशक्त

रणजीत सिंह पढ़े लिखे न होने के बावजूद, एक शानदार शासक और सामरिक रणनीतिकार थे। वह अपनी सेना को सर्वश्रेष्ठ बनाना चाहते थे, इसलिए उन्हें पश्चिमी तौर-तरीकों से भी कोई दिक्कत नहीं थी। उन्होंने अपनी “खालसा सेना” गठित की, जिसमें कई पश्चिमी अधिकारियों को भी नियुक्त किया गया।  उनकी सेना में भारतीयों के साथ-साथ फ्रांसिसी, इतालवी और यहां तक कि अमेरिकी सैन्य अधिकारी भी थे। अंग्रेज, रणजीत सिंह की सेना को भारत की सर्वश्रेष्ठ सेना मानते थे। बताया जाता है कि सेना में विदेशियों के लिए उन्होंने कुछ जरूरी शर्तें लगाईं कि वे न तो सिगरेट पिएंगे, न ही दाढ़ी कटाएंगे। उन्हें स्थानीय महिलाओं से शादी करने और पंजाब छोड़ने से पहले अनुमति लेने का आदेश दिया गया।

कभी किसी की हत्या नहीं की
जीवन के आखिरी दिनों में रणजीत सिंह के बोलने की शक्ति चली गई थी। लेकिन, वह अपने पूरे होशो हवास में थे और हाथों के इशारों से अपने सहयोगियों को राज्य की खबरें बताने के लिए कहते थे। उन्होंने अपनी नीतियों से कभी अंग्रेजों को अपने पास नहीं फटकने दिया। उनकी एक और खासियत थी कि उन्होंने युद्ध के अलावा कभी किसी की जान नहीं ली। वह अपने दुश्मनों को जीतने के बाद, हमेशा मानवीय तरीके से पेश आए।

महाराजा रणजीत सिंह ने अपने जीवन में कुल मिलाकर 20 शादियां कीं, जिसमें से 10 शादियां परंपरागत थीं और 10 शादियां चादर रस्म के जरिए । उन्होंने अपनी पहली शादी कन्हैया मिस्ल के संस्थापक जय सिंह कन्हैया की पोती मेहताब कौर से की। तब उनकी उम्र सिर्फ 15- 16 साल रही होगी।

मृत्यु

रणजीत सिंह की मृत्यु 27 जून 1899 को हुई और अंततः उनका शासनकाल समाप्त हो गया, उसके बाद उनके बेटे दलित सिंह उनके उत्तराधिकारी बने। उन्हें लाहौर में दफनाया गया था और उनकी समाधि अभी भी वहीँ है।

  READ ALSO-

किशन महाराज जीवनी – Biography of Kishan Maharaj in Hindi Jivani

ठुमरी गायकार गिरिजा देवी की जीवनी, गायकी का जूनून ऐसा की जला बैठी थी उंगलिया

दिल्ली मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल कोरोना संक्रमित, ट्वीट कर दी जानकारी

अनुराग बघेल

एडिटर: अनुराग बघेल

मेरा नाम अनुराग बघेल है। मैं बिगत कई सालों से प्रिन्ट मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़ा हूँ। पत्रकारिकता मेरा पैशन रहा है। फिलहाल मैं हिन्दुस्तान 18 हिन्दी में रिपोर्टर ओर कंटेंट राइटर के रूप में कार्यरत हूं।

Next Post

जन्मदिन विशेष निरुपा रॉय : 14 साल की उम्र में कर दी शादी, 300 फिल्मों में किया काम , कैसे फिल्मों में मां बनकर बनाई पहचान

Tue Jan 4 , 2022
जन्मदिन विशेष निरुपा रॉय : 14 साल की उम्र में […]
error: Content is protected !!