मुसीबतों को पार कर, तबाह की दुश्मन की चौकियां इस भारतीय जवान ने पाकिस्तान को कर दिया था तबाह

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राष्टीय / सम्पादकीय – 1947-48 के युद्ध के दौरान एक समय ऐसा आया, जब पाकिस्तानी सेना ने कश्मीर के तिथवाल सेक्टर को अपना निशाना बनाया और भारतीय सेना को किशनगंगा नदी पर बने मोर्चे से हटने के लिए मजबूर कर दिया। 18 जुलाई 1948 को 6 राजपूताना राइफ़ल्स को इस पोस्ट पर कब्ज़ा करने का काम सौंपा गया। विरोधी ऊंचाई पर मौजूद थे और भारतीय सेना नीचे।

ऐसे में उनका मुकाबला करना मुश्किल था। मगर राजपूताना राइफ़ल्स के कंपनी हवलदार मेजर पीरू सिंह ने इस असंभव से लगने वाले काम को संभव बना दिया। इस जांबाज़ ने पाकिस्तानी सेना की भारी गोलीबारी और हथगोले का न सिर्फ़ जवाब दिया, बल्कि उसके हथियारों से लैश बंकरों को नेस्तानाबूद किया। मरणोपरांत उन्हें वीरता और अदम्य शौर्य के लिए परम वीर चक्र से सम्मानित किया गया।

मास्टर साहब ने डांटा तो छोड़ दिया था । 20 मई 1918 को राजस्थान के बेरी गांव में रहने वाले लाल सिंह के घर पैदा हुए। अपने सात भाई-बहनों में सबसे छोटे पीरू को बचपन से ही पढ़ाई पसंद नहीं थी। छोटी उम्र का उनका एक किस्सा खासा मशहूर है। स्कूलों दिनों में एक दिन उनका अपने क्लासमेट से झगड़ा हो गया।

शिकायत मास्टर साहब के पास पहुंची, तो पीरू तलब किए गए। डांट के साथ उन्हें समझाया गया कि आगे से वह ऐसा न करें। पीरू को अपने मास्टर साहब का डांटना कितना बुरा लगा था। इसको इसी से समझा जा सकता है कि वह पीरू के स्कूल का आख़री दिन था। आगे वह वापस कभी स्कूल नहीं गए। आगे वह पिता के साथ खेतों पर काम करते हुए बड़े हुए। अठारह के हुए तो सेना में शामिल होने का प्रयास किया और सफल रहे। 20 मई 1936 का दिन पीरू के लिए खुशियां लेकर आया। दरअसल इसी दिन पीरू को झेलम में 1 पंजाब रेजिमेंट की 10वीं बटालियन में हिस्सा बनाया गया था।

1937 को पीरू को 5वीं बटालियन में तैनाती मिली, शुरूआती ट्रेनिंग के बाद पीरू 1 मई 1937 को पीरू को 5वीं बटालियन में तैनाती मिली। 1937 से लेकर अक्टूबर 1945 तक की अपनी नौकरी के दौरान पीरू सिंह को कई प्रमोशन मिले। ख़ास बात यह है कि बचपन से किताबों से दूर रहने वाले पीरू ने नौकरी के दौरान किताबों से दोस्ती की और कई परीक्षाएं पास कीं।

पढ़ाई ही क्यों, उन्होंने एक खिलाड़ी के रूप में भी ख़ुद को साबित किया। हॉकी से लेकर बास्केटबॉल तक उसने सब में ख़ुद को आज़माया। पीरू सिंह के सेवाकाल में द्वितीय विश्व युद्ध की आग भड़क गई। ऐसे में उन्हें ब्रिटिश कॉमनवेल्थ ऑक्यूपेशन फ़ोर्स के साथ जापान भेजा गया। जहां उन्होंने 1947 तक अपनी सेवा दीं। आगे भारत की आज़ादी के बाद उनका तबादला राजपूताना राइफ़ल्स की छठी बटालियन में कर दिया गया। 6 राजपूताना राइफ़ल्स का हिस्सा बनने के करीब एक साल बाद पीरू सिंह जम्मू कश्मीर के तिथवाल पहुंचे, जहां उनको पाकिस्तानी सेना द्वारा अधिकृत एक पहाड़ी पर भारतीय तिरंगे को लहराना था। काम मुश्किल था। विरोधी एक अच्छी-ख़ासी ऊंचाई पर मौजूद था।

मुसीबतों को पार कर, तबाह की दुश्मन की चौकियां

ऐसे में उनके द्वारा फेंका गया एक छोटा सा पत्थर भी भारतीय सेना के लिए बड़ी मुसीबत बन सकता था। मुसीबत भरे इस काम को पीरू सिंह ने द्वितीय विश्व युद्ध के अनुभव का प्रयोग करते हुए आसान बनाना शुरू कर दिया। आगे उन्होंने योजनाबद्ध तरीके से न सिर्फ़ दुश्मन से लोहा लिया, बल्कि एक-एक करके उसकी कई चौकियां तबाह कर दीं।

इस दौरान विरोधियों ने उन पर भारी गोलीबारी की और बड़ी मात्रा में हथगोले फेंके। इस हमले में पीरू सिंह के साथी एक बड़ी संख्या में शहीद हो गए। मगर पीरू सिंह बिचलित नहीं हुए। धैर्य का परिचय देते हुए उन्होंने साथियों से दुश्मन का मुकाबला करने को कहा। साथ ही विरोधियों के उन बंकरों को टारगेट किया, जो मशीनगन से लैश थे। इस संघर्ष के दौरान एक पल ऐसा भी आया, जब पीरू अपने टुकड़ी में जीवित बचे अकेले भारतीय थे।

पीरू के आसपास उनके साथियों के शव पड़े थे। मगर पीरू के पास चाहकर भी उन पर आंसू बहाने का वक्त नहीं था। वह तेजी से विरोधी की तरफ़ बढ़े। तभी एक हथगोले ने उन्हें लहुलुहान कर दिया। पीरू ज़मीन पर पड़े थे। उनकी अंतिम सांसें चल रही थे। मगर उनकी आंखें खुली थी, जिनमें एक सपना था। विरोधी ठिकाने को ख़त्म करने का सपना। इसे पूरा करने के लिए वह रेंगते हुए विरोधियों की तरफ़ बढ़े और अंतत: दुश्मन का ठिकाना ख़त्म करने में सफल रहे।

_ सतेन्द्र आर शर्मा ( मुख्य सम्पादक, हिन्दिस्तान की आवाज न्यूज़)

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