क्षमा करने वाला सुख की नींद सोता है

sleepक्षमा की प्रवृत्ति को पर्व रूप देना आध्यात्मिक निर्मलता का विकास है। मनीषियों ने कहा है कि ‘क्षमा करने वाला सुख की नींद सोता है, किंतु अक्षमावान को शय्या पर शूल बिखरे प्रतीत होते हैं।’ ‘ क्षमा’ केवल वाणी का विकास ही नहीं, वह अंत:करण की निधि है। शक्कर की मिठास तो जिह्वा पर ही प्रतीत होती है, परंतु क्षमा माधुर्य अंत:करण तक बना रहता है। क्षमा शांतिदायिनी है। किसी ने कहा, जहां तिनका भी नहीं हो, ऐसे स्थान पर गिरी हुई आग अपने आप बुझ जाती है। इसी प्रकार जिसने शांति धारण की है, उसका दुष्ट क्या बिगाड़ सकता है? भगवान महावीर ने कहा है- हमारे नेत्रों का सौंदर्य काजल से नहीं, दृष्टि में ‘मित्रता का अंजन’ लगाने से है। वैदिक महर्षियों ने कहा, ‘सर्वत्र हमें मित्रता की प्राप्ति हो।’ वास्तव में क्षमा का सुखद परिणाम मित्रता है। कृतज्ञता, विनय, मैत्री आदि सद्वृत्तियों के मूल में क्षमा रूपी अमृत है। क्षमा से अहिंसा को नवजीवन मिलता है। अहिंसा का नामांतर क्षमा है। ‘क्षमा’ शब्द में जो ‘क्ष’ अक्षर है, उसमें ग्रंथि (गांठ) लगी हुई है। संस्कृत में ‘मा’ शब्द का अर्थ निषेध है। मन में ‘क्ष’ के समान घुंडी मत रखो- यही ‘क्षमा’ का संदेश है। क्षमा का अर्थ दुर्बलता नहीं, वीरता है। दुर्बल की ‘सहिष्णुता’ को ‘कायरता’ कहते हैं तथा वीर की सहनशीलता को ‘क्षमा’। लेकिन वह ‘क्षमा’ कफन में लिपटे शव के समान है, जिसे व्यवहार में नहीं लिया। क्षमा जीवन है। जीवन जीने की निर्दोष प्रक्रिया है। क्षमा दुर्घटनाओं से बचाती है। वह सबको मार्ग देती है। क्षमा के अभाव में बड़ी मछली छोटी मछली को निगल जाती है। मानव समाज में यदि निर्बल-सबल साथ-साथ जीवित हैं तो यह क्षमा का ही उदाहरण है। बड़े-बड़े आयोजन कर क्षमा का गुणगान ऊंचे स्वर में मत करो, उसे प्राणों के साथ रखकर कार्य करने दो। तुम देखोगे, जिसे तलवार से नहीं काट सके, क्षमाशास्त्र से अपनाकर आनंद रूप बना लोगे। तलवार शत्रुत्व की सूचना है, हिंसा का उपकरण है, जबकि क्षमा मित्रता की मंगल ध्वनि। वह अहिंसा की घटक है। तलवार टुकड़े करती है, क्षमा जोड़ती है। क्षमा मनोबल को बढ़ाती है। यह ऐसा रत्न है, जो व्रतियों की आत्मा ने पहना है। क्षमा से समता भाव की वृद्धि होती है। क्षमारहित व्यक्ति के हृदय में वैर की रेखाएं ऐसी होती हैं मानों किसी चट्टान पर उकेर दी गई हों, किंतु क्षमावान व्यक्ति के हृदय में वैर भाव उसी तरह नहीं टिकता जैसे पानी पर लिखा नहीं दिखता। क्षम विनय धर्म है, सामाजिक शिष्टता का अलंकरण है। क्षमा निष्पाप है, पावन है। क्षमा शांति वन है। क्षमा से अहिंसा और अहिंसा से क्षमा पालन सीखना चाहिए। ‘परस्परोपग्रहो जीवानम्’ यह सूत्र मत्स्य न्याय का विरोधी अहिंसक ही लिख सकता है। ‘जीओ और जीने दो’- यह जितना अहिंसापरक है, उतना क्षमामय भी। क्षमा दूसरे के जीवन की अभिवृद्धि चाहती है और स्वयं निराकुलता। विश्व धर्म के दशलक्षणों का आरंभ ‘उत्तम क्षमा’ से होता है और इसकी पूर्णता ‘क्षमापन पर्व’ से। क्षमा को विचार नहीं, आचार बनाओ। पानी पीने के लिए है, कलश भरने के लिए नहीं। उसकी शीतलता कंठ को चाहिए, जलाशय को नहीं। क्षमा के पाठ तो बहुत पढ़ लिए, अब पढ़े हुए का अनुशीलन करो तो न्यायालयों की भीड़ कम हो जाए तथा सीमा पर शस्त्रपंक्तियों का स्थान मित्र गोष्ठियां लेने लगें। सन्मति ही क्षमा का संदेश दे सकती है। दुर्मतियों को यह बात समझ में नहीं आती। क्षमावान नित्य नंदन वन में रहता है और क्षमारहित शुष्क दावानल में दग्ध होता है। ‘क्षमा’ एक उत्कृष्ट शब्द है, जो किसी उन्नत संस्कृति के धर्मकोष में पाया जाता है। हम ‘विश्व मैत्री दिवस’ मनाते हैं, कहीं उसका तात्पर्य यह तो नहीं कि इस दिवस के अतिरिक्त हम शत्रुता के परिवेश में
रहते हैं। मेरा तो विचार यह है कि मित्रता के दिवस नहीं, वर्ष और कल्प मनाने चाहिए। जब मित्रता स्थायी रूप से अंत:करण में निवास करने लगे, तभी वह निवैर्र अवस्था को प्राप्त कर सकती है। मित्रता को भी, जो सदा अपेक्षित है, उपचार दिवस तक सीमित कर देना अपनी प्रसन्नता के क्षेत्र को सीमित करना है।

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Author: Hindi Desk

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