शिव धर्म प्राणधर्म…..

Shivaभगवान शिव कह गए हैं– तुम मन के भीतर, आत्मा के भीतर जितना भी चाहो, बढ़ते चलो। ‘चरैवेति, चरैवेति’। किन्तु बाहरी जगत की उपेक्षा मत करो, क्योंकि बाहरी जगत की उपेक्षा से तुम्हारे अन्तर जगत में भी विघ्न पैदा होगा।

इस प्रकार शैव मत या शैव धर्म बन गया भारत का प्राणधर्म। शिव का धर्म ईश्वर की प्राप्ति का धर्म है।  इस कारण इसमें बहिरंगिकता नहीं है। यज्ञ में घी की आहुति देकर, पशु की आहुति देकर तुच्छ आत्मतृप्ति पाने का पथ यह नहीं है। उन्होंने वज्र कंठ से घोषणा की है- धर्म परम संप्राप्ति का पथ है, पाशविक सुख भोग का पथ नहीं।

शिव व्यावहारिक जीवन में कोमल थे, अति कोमल… कुसुमादपि कोमल यानी फूल से भी कोमल।  शिव की नीति थी- मनुष्य है, वह तो भूल-चूक करेगा ही। वह मनुष्य है, देवता तो नहीं है। और साधारण मनुष्य, वह तो भूल कर ही सकता है। साधारण मनुष्य ने भूल की है, कल वह सुधर भी तो सकता है। आज रास्ते पर चलते हुए कपड़ों पर धूल-कीचड़ लग गया तो कल वह साफ कपड़े पहनने का सुयोग क्यों नहीं पा सकेगा? इस कारण उनकी नीति थी, जिसने अन्याय किया है, उस पर त्रिशूलाघात करो। जिस मुहूर्त में उसने अपनी भूल को सुधार लिया है, उसे प्यार से गोद में बैठा लो। अर्थात उन्होंने जो भी किया, वह मनुष्य के संशोधन के लिए ही किया।

शिव को प्रणाम करते समय कहा जाता है- हे पिनाकपाणे, हे वज्रधर! तुम्हें नमस्कार करता हूं,, क्योंकि तुम्हारा यह वज्र मनुष्य को कष्ट देने के लिए नहीं, बल्कि मनुष्य को सुधारने के लिए है। शिव मन-प्राण से मनुष्य के अतीत का सब कुछ भूल जाते हैं। इसीलिए अनुतप्त मनुष्य शिव के सम्मुख नतजानु होकर कहा करता है- ‘तुम्हारी शरण में नहीं आऊं तो किसकी शरण में जाऊं, तुम्हें छोड़ मुझे और कौन शरण देंगे, तुम भोलेनाथ हो। मैंने इतने पाप किए हैं, उन्हें सुधार देने के साथ ही साथ तुमने मुझे क्षमा कर दिया। हे ईश्वर, तुम इतनी सहजता से सन्तुष्ट हो जाते हो, तुम आशुतोष हो।’ लोग जिनसे घृणा करते थे, उन असुरों ने शिव की शरण मांगी।

शिव ने असुरों को शरण दी। असुरगण स्तुति के लिए शिव के पास खड़े हैं, उन्हें वरदान मिल रहा है और  शिव ने असुरों को बचाया था। शिव ने कहा था- यदि मैं इन्हें न बचाऊं तो कौन बचाएगा। ये किनके आश्रय में जाएंगे? शिव ने हर समय चाहा है और ऐसा काम भी किया है, जिससे संपूर्ण विश्व अंत में शांतिपूर्ण ढंग से जीवन-यापन कर सके।  शांतिपूर्ण ढंग से जीवन-यापन करने के लिए एक उत्कृष्ट आदर्श को ग्रहण करना ही पडे़गा, क्योंकि यदि आदर्शों में संघात हुआ तो मनुष्यों मे संघात होगा ही और शांतिपूर्ण ढंग से सह-अस्तित्व की स्थापना नहीं हो सकेगी।

आदर्श के रूप में शिव ने सब को सिखाया है- तुम सब परम पिता की संतान हो, तुम सब को इस पृथ्वी पर भाई-भाई की तरह, भाई-बहन की तरह वास करने का अधिकार है। तुम लोग इस अधिकार में सुप्रतिष्ठित हो सको, आदर्श में पुनर्वासित हो सको, इस कारण तुम सबकी मदद के लिए मैं सदा सर्वदा प्रस्तुत हूं।

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Author: Hindi Desk

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