आपकी जूतों पर चमक लाने वालों की जिंदगी से चमक गायब है: ये मोची हैं साहब!

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देवनाथ (वरिष्ठ पत्रकार), प्रधान संपादक अमर भारती समूह

मोची! जी हां मोची समझते हैं ना आप! वही जो आपके जूते चमकाते हैं, वही जो आपके फटे जूते में पैबन्द लगाते हैं, वही जो आपके जूते बनाते हैं। मोची भारत की वह प्रजाति है जिनके बारे में कोई नहीं सोचता।

भारत के किसी भी राजनीतिक दल के चुनावी घोषणा पत्र में इनके लिए कोई जगह नहीं है। राजनीतिक पार्टियों के एजेंडे से मोची बाहर है। राजनेताओं की संवेदना इनके लिए नहीं होती, कम्बल गिरोह के फोटूबाज समाजसेवी मोची के पास नहीं जाते। बड़े-बड़े अफसरों की समाजसेवी पत्नियां इनके लिए कुछ नहीं करना चाहती।

राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता इन्हें नजरदाज करते हैं। पार्षद, स्थानीय नेता तो मोचियों से मुंह फेर लेते हैं, जाहिर है आपके जूतों पर चमक लाने वालों की जिंदगी से चमक गायब है।

जूता सिलने वाले मोची की प्रतीकात्मक तस्वीर

ऊंची-ऊंची अट्टालिकाओं के नीचे छोटे-छोटे बच्चों को जूता पॉलिश करते देख अगर आपका दिल नहीं पसीजता तो आप दिलवाले नहीं हो सकते। बड़े बेअदबी से जूते की नोंक पर काम कराने वाले बेदर्दों को देखकर आपका कलेजा नहीं फटता तो खुद के इंसान होने पर शक कीजिए। भीषण गर्मी, कड़ी दोपहरी में जूतों की पॉलिश करने वालों पर अगर आपकी आंखे नम नहीं हुई तो कृपया अपनी आंखें चेक करा लीजिए। महज 20 रुपये की खातिर आपके जूते अपने हाथ में लेने वालों के लिए अगर आप नहीं सोचते तो अपने मानवीय गुणों की कमी पर चिन्तित हो जाइए।

50 साल के राम जी के जीवन की रफ्तार उनके हाथ में है। इधर उनका हाथ चलना बंद हुआ और उधर उनका परिवार चलना बंद। राम जी का परिवार तब तक जिंदा है जब तक वो जूतों पर अपना हाथ चलाते रहें, लेकिन अब सब कुछ इतना आसान नहीं रह गया है। उम्र की चादर लम्बी हो रही है और जीवन रूपी शरीर छोटा। मतलब साफ है कि न तो शरीर में ताकत है और ना ही वो जज्बा जिससे जीने की उम्मीद बचे, लेकिन हमारी तरह राम जी के पास कोई विकल्प नहीं है। वो आराम चाहते हैं लेकिन काम बंद करते ही निवाला बंद हो जाएगा। ऐसे में सवाल ये उठता है कि आजादी के इतने वर्ष बाद भी मोची किसी राजनीतिक पार्टी के घोषणा पत्र में क्यों नहीं शामिल हुआ?

जिनके पास अपना मकान है वे मोची के बेघर होने का दर्द नहीं समझ सकते। मोची खुले आसमान के नीचे पालथी मार कर बैठता है। धूप, गर्मी, बरसात से लड़ते मोची की मदद के लिए सिर्फ एक ही व्यक्ति होता है और वह स्वयं मोची ही होता है। 50 साल के दिलीप बाबू देश के सबसे लोकप्रिय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को नही जानते। उत्तर प्रदेश के बेहद ऊजार्वान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का नाम उन्होंने कभी नहीं सुना। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि क्या सरकार मोचियों को विकास के एजेण्डे से बाहर रखती रही है? जनकल्याण योजनाओं में मोची के लिए क्या कोई जगह नही है? क्या देश के सर्वाधिक लोकप्रिय प्रधानमंत्री का नाम नहीं जानने वाला मोची मुख्य धारा से बाहर नही हो गया है? दलितों के लिए झण्डा उठाने वाले राजनीतिक पार्टियों के एजेण्डे से मोची गायब क्यों हैं? सरकारी माल के ठेकेदार अफसरों को मोचियों की याद क्यों नही आई? लगभग 15 साल से एक ही जगह बैठकर जूता चमकाने वाले बिरजू की जिंदगी फीकी है। पैसे के अभाव के चलते शादी तक नहीं की दिनभर बैठने के बाद 100 से 200 कमाने वाले बिरजू का दर्द तब और अधिक बढ़ जाता है जब उससे पूछा जाता है कि पिछले 15 वर्षों में क्या कोई नेता तुमसे मिलने आया? बिरजू की सूनी आखों में आक्रोश दिखाई देने लगता है. व्यथित हो जाता है और बड़े मायूसी से कहता है। नहीं कोई नही आया।

हिन्दुतान 18 न्यूज़ रूम

एडिटर: हिन्दुतान 18 न्यूज़ रूम

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