इस तरह छपी थी दुनिया की पहली किताब – जानें किताब की कहानी

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आज छपी हुई किताबें बाज़ार में आसानी से और कम कीमतों पर मिल जाती हैं, पर पहले ऐसा नहीं था। किसी एक किताब को पाने के लिए महीनों क्या, बरसों भी इंतज़ार करना पड़ जाता था। तब किताबें केवल धनी लोगों के पास ही पहुँचती थीं। गरीब लोग तो उन्हें पाने की सोच भी नहीं सकते थे। इसलिए कि छपाई मशीन के आविष्कार से पहले किताब तैयार करना बहुत कठिन काम था। हर किताब का एक-एक अक्षर हाथ से लिखना पड़ता था, तब कहीं मुश्किल से किताब की नकल तैयार होती थी।

किसी किताब की पाँच-दस प्रतियाँ ‘ तैयार करने में भी बहुत समय लग जाता था। उनमें भी कई गलतियाँ रह जाती थीं। छपाई मशीन की खोज के बाद किताबें छापना इतना आसान हो गया कि थोड़े ही समय में हम किसी भी किताब की हज़ारों लाखों प्रतियाँ तैयार कर सकते हैं। यह चमत्कार जिस महान है योहानेस गुटेनबर्ग।

वैज्ञानिक के कारण हो पाया, उसका नाम योहानेस गुटेनबर्ग का जन्म आज से कोई 600 साल पहले जर्मनी के मेंज शहर में हुआ था। इनके पिता मेंज के जाने-माने अकाउटैंट थे। घर की हालत अच्छी थी। वे बड़े मनमौजी और धुनी बालक थे, अपने ढंग से जीने वाले। उनकी दोस्ती सुनारों, दस्तकारों और मोहर बनाने वालों से थी, गली में जिनकी काफ़ी दुकानें थीं। उनकी संगति’ में गुटेनबर्ग ने इस तरह के काफ़ी काम सीख लिए थे। धातुओं को मिलाकर अलग-अलग तरह की धातुएँ बनाने के काम में वे कुशल हो गए। तभी उनके मन में बड़ा अनोखा ख्याल आया। वे सोचने लगे, क्या रबर की तरह ही धातु के अक्षर नहीं ढाले जा सकते? उन्हें लगा अगर वह इस काम को कुशलता से कर लें तो वे एक ऐसी छपाई मशीन बना सकते हैं, जिससे किताबें बहुत आसानी से छापी जा सकती हैं और यह ज्ञान की दुनिया में एक क्रांति जैसी चीज़ होगी, क्योंकि इससे किताब की प्रतियाँ तैयार करने में लगने वाला मनुष्य का बहुत सा श्रम और समय बच जाएगा।

छपाई मशीन के बारे में सोचना जितना आनंददायक था, वास्तव में उसे रूप देना उतना ही मुश्किल था। पर गुटेनबर्ग कठिनाइयों से घबराते नहीं थे। उन्होंने हर चीज़ के लिए पहले अपने आपको तैयार कर लिया था। मन ही मन वे हर मुश्किल का हल सोचने में जुटे रहते थे।

सबसे पहले तो उन्होंने हर अक्षर की सुंदर ड्रॉइंग तैयार की, फिर उन्हीं के आधार पर लकड़ी के अक्षर बनाए। बाद में सब अक्षरों के साँचे बनाए और धातु के अलग-अलग अक्षर बनाए। वे चुपचाप इन सारे कामों में जुटे रहे और मन ही मन छपाई मशीन की योजना पर काम करते रहे। वे चाहते थे जब तक छपाई मशीन बनकर तैयार न हो जाए, उनकी यह खोज गुप्त ही रहे।

आखिर एक धनी मित्र की मदद से गुटेनबर्ग ने सन् 1450 में छपाई की पहली मशीन लगाई। उनकी इस प्रिंटिंग मशीन में छपने वाली पहली किताब थी लैटिन की बाइबल।

अपने पहले प्रयास में ही गुटेनबर्ग ने कितनी होशियारी और सफ़ाई से काम किया था, यह इसी से पता चलता है कि उनकी प्रेस में छपने वाली पहली किताब के हर पन्ने पर ब्यालीस पंक्तियाँ थीं। एक और खास बात यह थी कि गुटेनबर्ग न अलग-अलग अक्षरों को ढाला था, इसलिए छपने के बाद किसी एक पन्ने के अक्षरों से फिर अगले पन्ने भो तैयार किए जा सकते थे।

गुटेनबर्ग को इस बाइबल को छापने में तीन साल तक मेहनत करनी पड़ी। पर यह सच में बड़ी सुंदर और दर्शनीय पुस्तक थी। उनके द्वारा छापी गई बाइबल को आज हम ‘गुटेनबर्ग की बाइबल’ के नाम से जानते हैं। इसके छपने के कोई पाँच सौ साल बाद न्यूयॉर्क में इसकी एक प्रति एक लाख बीस हज़ार डॉलर में बिकी थी।

गुटेनबर्ग की के बाद उनके जन्म स्थान पर उनके नाम से एक बहुत बड़ा संग्रहालय बनाया गया था। अनेक नगरों में मृत्यु उनके स्मारक खड़े किए गए और आज भी लोग उन्हें एक महान ज्ञान-विज्ञान के दूत के रूप में याद करते हैं।

साभार: डॉ सुनीता

हिन्दुतान 18 न्यूज़ रूम

एडिटर: हिन्दुतान 18 न्यूज़ रूम

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